सांकेतिक तस्वीर। नीतीश कुमार बाढ़ का मुआयना करते हुये। Image Source : tweeted by @NitishKumar

55000 करोड़ खर्च दिये, सरकार के पास हिसाब-किताब ही नहीं, आपदा, पंचायती राज, ग्रामीण विभाग की कारस्तानी

Patna : बिहार के तीन विभागों ने हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दिये, लेकिन आज उनके पास कोई हिसाब-किताब नहीं है। पिछले दो साल से अकाउंटेंट जनरल हिसाब मांग रहे हैं, लेकिन बिहार सरकार हिसाब नहीं दे पा रही है। और यह कोई मामलूी रकम नहीं है। सरकार को पूरे 55,405 करोड़ रुपये के खर्च का हिसाब किताब देना है। हद तो यह है कि करीब 25 हजार करोड़ का हिसाब किताब सिर्फ तीन विभागों के खर्च से जुड़ा है। पहले नंबर पर है आपदा विभाग और दूसरे तीसरे नंबर पर पंचायती राज विभाग और ग्रामीण विकास विभाग है। यह राशि साल 2016 से 2019 के बीच खर्च दी गई। खर्च करने के समय अफसरों और मंत्रियों ने तो राजा की तरह फैसले लिये लेकिन जैसे ही हिसाब किताब मांगना शुरू हुआ विभाग बगले झांकने लगे। अब बारमबार यह मामला राज्य सरकार के संज्ञान में लाया जा रहा है। पर सरकार की ओर से गोलमटोल जवाब दिया जा रहा है।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक आपदा प्रबंधन से 14864 करोड़, पंचायती राज से 13073 करोड़ और ग्रामीण विकास से 6579 करोड़ रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र मिलना बाकी है। इतना ही नहीं , 5770 करोड़ कच्चे (एसी) बिल पर सरकारी विभागों ने खर्च कर दिया लेकिन उसका पक्का (डीसी) बिल ही नहीं दिया। अपर उप नियंत्रक-महालेखापरीक्षक राकेश मोहन के मुताबिक यह रकम वित्तीय वर्ष 2016 से 2019 के बीच की है। बकौल राकेश मोहन नगर एवं आवास और पंचायती राज विभाग तो ऑडिट में सहयोग ही नहीं कर रहे हैं। दोनों विभाग कोई रिकॉर्ड ही नहीं दे रहे हैं। सीएजी अपने संवैधानिक दायित्व के तहत विभागों का ऑडिट करता है। अगर कोई विभाग इसमें सहयोग नहीं करता है तो यह गंभीर मामला बनता है। वह बुधवार को राज्य सरकार के अधिकारियों से मिलने के बाद पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत कर रहे थे।
बिहार जैसे राज्यों में खुद के राजस्व की कमी रहती है। लेकिन राज्य के 175 पीडी खाते (पसर्नल डिपोजिट खाते) में 4377 करोड़ हैं। चार साल से 9 पीडी खाते में करीब 66 करोड़ रुपये पड़े हुये हैं। इस राशि को राज्य के समेकित निधि में जमा किया जाना चाहिये। पीएल खातों में भी 35 करोड से अधिक राशि पड़ी हुई है। बैंक की तरह ही राज्य के कोषागारों में विभागों का खाता होता है। इसमें स्कीम मदों की राशि ही रखी जाती है। लेकिन आमतौर पर विभाग वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन जो राशि खर्च नहीं कर पाता है, उसे भी इसी खाते में पार्क कर देता है। जबकि नियमानुसार उस राशि को समेकित निधि में जमा किया जाना चाहिये।

राकेश मोहन ने बिहार के बजट निर्माण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। कहा कि बजट बनाने की प्रक्रिया तर्कसंगत नहीं है क्योंकि, बजट अनुमान और वास्तविक खर्च में भारी अंतर है। वित्तीय वर्ष 2018-19 में राज्य का बजट 2.09 लाख करोड़ था, जबकि खर्च 1.60 लाख करोड़ ही हुआ यानी कुल बजट का 23 फीसदी खर्च नहीं हो सका। बिहार धीरे-धीरे वित्तीय सरप्लस से घाटे की ओर बढ़ रहा है। वर्ष 2018-19 में 6897 करोड़ सरप्लस था लेकिन 2019-20 में 2000 करोड़ घाटे का अनुमान है। कोरोना महामारी से वर्ष 2020-21 में स्थिति और खराब हो सकती है।

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