IAS में नहीं मिली सफलता, बिहारी ने गांव की पैदावार से खड़ा कर दिया सैकड़ों करोड़ का बिजनेस

पटना

आपको कोई बिहारी  देशभर में बिहार के युवकों को लेकर एक आम सी समझ है। हर युवक सिविल का तैयारी तो करता ही है। वैसे ये समझ निराधार नहीं भी है। संसाधनों के मामले में दूसरे राज्यों से अक्सर पीछे दिखऩे वाले बिहार के नौजवानों का साहस ही है कि वो न केवल भारत की सबसे कठिन परीक्षा का सपना देखते हैं बल्कि हर साल काफी संख्या में चयनित भी होते हैं। पर सिविल सर्विस में सीटें इतनी कम होती हैं कि कई बार काफी तेज तर्रार बिहारी युवक के सपने भी टूट जाते हैं। ऐसे में क्या हौसलों को हार मान लेनी चाहिए? नहीं, कत्तई नहीं। ऐसे में हमें बिहार के सत्यजीत सिंह की कहानी पढ़नी चाहिए। IAS में असफलता नहीं मिलने पर बहुतों को टूटते देखा होगा लेकिन बनने की अगर कहानी कही जाएगी तो उसमें बिहार के जमुई के लाल सत्यजीत सिंह की कहानी भी जरूर सुनाई जाएगी। उन्होंने करियर में मिली असफलता के बाद अपनी ऊर्जा को गांव-घर की एक खास उपज से जोड़ा और आज उनकी कंपनी सैकड़ों करोड़ का टर्नओवर कर रही है।

मखाना से संवारा अपना और हजारों किसानों का भविष्य

हम जिस गांव-घर की उपज की बात कर रहे हैं, वो है मखाना, जिसे बिहार की शान कहा जाता है। पर मखाना से सैकड़ों करोड़ का टर्नओवर, वो कैसे? इसकी कहानी डेढ़ दशकों की है। आइए आपको बढ़ते बिहार की इस कहानी से विस्तार से रुबरू करवाते हैं। सत्यजीत सिंह का जन्म जमुई के वरिष्ठ अधिवक्ता स्वर्गीय रंजीत कुमार सिंह के यहां हुआ था। सत्जीत ने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास में एमएम कंप्लीट करने के बाद सिविल की तैयारी की। लेकिन उसमें सफलता हाथ नहीं लगी तो टीवी कंपनी बीपीएल के लिए काम करने लगे। एक बार इसी कंपनी के काम से सत्यजीत सिंह बेंगलुरु गए हुए थे। लौटते वक्त उनकी मुलाकात मखाना नेशनल रिसर्च संस्थान के डायरेक्टर डॉक्टर जर्नादन से हुई। इस मुलाकात ने सत्यजीत सिंह के जीवन की दिशा और दशा, दोनों को बदलने का काम किया।

2007 में मखाना किसानों को मिलते थे किलो पर बस 60 रुपये

सत्यजीत सिंह ने डॉक्टर जनार्दन से मुलाकात के बाद मखाना उत्पादन की तरफ अपनी उर्जा को झोंक दिया। वो मखाना के किसानों से मिलने लगे, उनकी समस्याओं और जरूरतों को समझने लगे। मां दुर्गा और साईं बाबा के भक्त सत्यजीत सिंह ने शक्ति सुधा नाम से कंपनी शुरू दी। शक्ति यानी मां दुर्गा और सुधा यानी पत्नी, नारी शक्ति का दूसरा शब्द। सत्यजीत बताते हैं कि 2007 तक हाल ये था कि मखाना के किसानों को प्रति किलो मात्र 60 रुपये मिलते थे। अब स्थिति यह है कि मखाना के किसान 450 रुपये से अधिक का दाम प्रति किलो हासिल कर पा रहे हैं।

15000 किसानों से अधिक का नेटवर्क

पटना से सत्यजीत सिंह ने मखाना के दम पर एक छोटी सी शुरूआत की थी जो आज वटवृक्ष बन गई है। आज इनकी कंपनी से 15000 से अधिक किसान जुड़े हैं। 2018 में उनकी कंपनी का टर्नओवर 167 करोड़ को पार कर गया था। उन्होंने 2022 के लिए एक हजार करोड़ से अधिक के टर्नओवर का लक्ष्य बनाया है। अब आप कल्पना कीजिए कि गांव घर की पैदावार जो निराशा के सागर में जा रही थी, सत्यजीत सिंह ने अपने जुनून से उसे एक शानदार इंडस्ट्री में तब्दील कर दिया। फर्क सिर्फ सोच का था। सकारात्मक सोच और काम करने के जुनून ने उन्हें तब भी मजबूती से खड़ा किया जब सिविल में वो सफल नहीं हुए। आज उनकी कंपनी देश के 18 से अधिक राज्यों और दुनिया के करीब 22 देशों में कारोबार कर रही है। यानी सत्यजीत सिंह ने सही मायनों में एक लोकल प्रोडक्ट को ग्लोबल बना वोकस फॉर लोकल होने का काम कर दिखाया है।

IIM की किताब में आ चुका है नाम, मिले हैं ये इनाम

अपने शानदार प्रयासों की वजह से सत्यजीत सिंह को अबतक ढेरों सम्मान मिल चुके हैं। उन्हें 2006 में चौधरी चरण सिंह अवॉर्ड मिला। इसके अलावा वर्ल्ड बैंक ने उन्हें इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया। इतना ही नहीं, भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित मैनेजमेंट कॉलेज, आईआईएम अहदाबाद की किताब ‘कनेक्ट द डॉट्स’ में भी उन्हें शामिल किया गया। IIM ने उन्हें 20 ऐसे उद्यमियों के बीच जगह दी, जिन्होंने बिना एमबीए की डिग्री के खुद का सफल कारोबार खड़ा कर दिखाया।

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