बर्थडे स्पेशल: बिहार कोकिला ने छठ के गीत को घर-घर पहुंचाया, पर क्या असफलता वाली कहानी जानते हैं आप

पटना
आज बिहार कोकिला कही जाने वाली शारदा सिन्हा का जन्मदिन है। बिहार को अपने जिन नामों पर गर्व होता है उनमें से हमेशा कोई एक नाम रहेगा तो वो शारदा सिन्हा का भी होगा। पिछले दिनों शारदा सिन्हा कोरोना संक्रमित हुई थीं। सोशल मीडिया के इस जमाने में कुछ असामाजिक तत्वों ने उनके निधन की झूठी खबर वायरल कर दी। ये खबर सोशल मीडिया पर इतना तेज दौड़ी कि शारदा सिन्हा को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी। हालांकि ईश्वर की कृपा से सब ठीक रहा और आज फिर शारदा सिन्हा हंसी खुशी हमारे बीच में हैं। शारदा सिन्हा ही वह पहली आवाज हैं, जिन्होंने छठ के गीत को घर-घर तक पहुंचाया। आज शारदा सिन्हा को देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक पद्मभूषण मिला हुआ है लेकिन क्या ये सब इतना आसान था?

आज शारदा सिन्हा का जन्मदिन है। अक्सर लोगों को सफलता की कहानियां सुनाई जाती हैं। लेकिन कोई पैदा ही सफल नहीं होता। सफलता के लिए सतत परिश्रम की बेहद जरूरत होती है। शारदा सिन्हा उसी परिश्रम और खुद पर भरोसा रख आगे बढ़ने की मिसाल हैं। ऐसे में उनके जन्मदिन के अवसर पर हम बिहार एक्सप्रेस के अपने पाठकों के लिए ये खास पेशकश लेकर आए हैं।

छठ का पहला गीत, कंपनी कैसेट बनाने को नहीं थी तैयार

हर बिहारी ने शारदा सिन्हा को वो फेसम छठ गीत ‘उगो हो सूरज देव भइल अरघ के बेर’ जरूर सुना होगा। यूट्यूब और तमाम सोशल मीडिया पर इस गीतों के करोड़ों व्यू हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा था जब कैसेट कंपनी इस गीत पर कैसेट निकालने के लिए तैयार ही नहीं थी। असल में ये मामला 1980 के दशक का है। तब छठ गीत देश की हिंदी पट्टी में उतने लोकप्रिय नहीं थे। इसी दौरान शारदा सिन्हा ने इस गीत को आवाज दी। लेकिन कोई कैसेट कंपनी इसपर कैसेट रिलीज करने को तैयार नहीं थी। मीडिया में छपी रिपोर्ट्स के मुताबिक तब एचएमवी कैसेट कंपनी से यह कहा गया कि अगर नुकसान हुआ तो इसकी भरपाई स्वयं की जाएगी। तब जाकर यह कैसेट बना और इस कदर लोकप्रिय हुआ कि लोक गायिका के रूप में शारदा सिन्हा लोगों के मानस में बस गईं।

पहले ऑडिशन में भी मिलती असफलता पर यूं बनी बात

आज शारदा सिन्हा सम्मान और सफलता के शीर्ष पर हैं। ऐसी जगह पर हैं, जहां पहुंचने का सपना हर लोक गायक गायिका का होता है। पर जीवन में कुछ हासिल करना है तो आपको असफलता का भी डंटकर सामना करना आना चाहिए। जैसा अपने पहले ऑडिशन में शारदा सिन्हा को करना पड़ा था। ये कहानी उन्होंने खुद सुनाई थी। एक बातचीत के दौरान शारदा सिन्हा ने बताया था कि 1980 के दशक में उन्हें लखनऊ में एक टैलेंट सर्च के बारे में पता चला था। अपने पति के साथ वो उसमें हिस्सा लेने पहुंच गईं।

ऑडिशन अभई स्टार्ट ही हुआ कि वहां मौजूद शख्स ने सीधे कह दिया कि उनकी आवाज ठीक नहीं है। शारदा सिन्हा निराश हो गईं। तब उनके पति बीके सिन्हा ने उनका हौसला बढ़ाया। यही एक मार्के वाली बात है। हमें हमेशा एक ऐसे साथी की जरूरत होती है जो असफलता के समय हमारा हाथ और मजबूती से पकड़ कर खड़ा हो जाए। पति ने कहा कि अभी हार नहीं माननी है। एक बार और प्रयास करेंगे। अगले दिन वो लोग फिर ऑडिशन को पहुंचे और इस बार संयोग से कंपनी के जीएम को गाना पसंद आ गया। फिर क्या था। फिर थी एक लंबी मेहनत और शानदार करियर।

ये दो वाकये ऐसे थे, जिन्हें आज मुड़कर देखें तो लगेगा कि अगर उस बिंदु पर शारदा सिन्हा हार मान जातीं तो क्या होता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं होने दिया। खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखा और संगीत को साधना की तरह लिया। आज के यंगस्टर्स के लिए साधना सिन्हा एक मिसाल हैं। हम अपनी तरफ से भी उनके अच्छे स्वास्थ्य और लंबे जीवन की कामना करते हैं। बिहार कोकिला को जन्मदिन मुबारक हो।

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