हर घर में पढ़ी जानी चाहिए महापर्व छठ की ये पौराणिक कथाएं, सीता-राम, द्रौपदी से हैं जुड़ी

पटना

दीपावली बीत चुकी है और अब छठ महापर्व तैयारी शुरू हो चुकी है। मुख्य रूप से बिहार और झारखंड में मनाया जाने वाला छठ का त्योहार अब पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ भारत के अन्य हिस्सों में भी धूमधाम से मनाया जाने लगा है। यह त्योहार सूर्य़देव की पूजा से जुड़ा हुआ है। अक्सर हमारे मन में ख्याल आता है कि आखिर इस भव्य छठ महापर्व की शुरुआत हुई कैसे? इसके बारे में तरह-तरह की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं के बारे में यहां हम आपको बता रहे हैं।

द्रौपदी वाली कथा

छठ पर्व को लेकर एक कथा कुछ इस तरीके की है कि जब जुए में पांडव अपना सारा राजपाट हार गए थे, तो इसके बाद उनकी पत्नी द्रोपदी ने छठ मैया का व्रत रखा था, जिसकी वजह से राजपाट पांडवों को दोबारा मिल गया था। लोक परंपरा यही रही है कि छठी मैया का सूर्य देव के साथ भाई-बहन का रिश्ता जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि छठ पूजा के अवसर पर भगवान सूर्य की आराधना की जाती है।

रामायण का प्रसंग

छठ पूजा को लेकर एक कथा रामायण के समय की भी है। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान श्री राम रावण का वध करके लंका से लौटे थे तो कार्तिक शुक्ल षष्ठी को राम राज्य की स्थापना के दिन भगवान श्री राम और माता सीता ने व्रत करके भगवान सूर्य की आराधना की थी। यही नहीं, अगले दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय से ही उन्होंने अनुष्ठान किया था और भगवान सूर्यदेव से उनका आशीर्वाद हासिल किया था। ऐसे में तभी से छठ पर्व मनाया जा रहा है।

पुराणों में जिक्र

पुराणों में छठ पूजा की शुरुआत को लेकर एक और कथा का जिक्र मिलता है। इसमें बताया गया है कि राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं होने पर महर्षि कश्यप के कहने पर उन्होंने यज्ञ करवाया था, जिसके बाद मिली खीर को खाने के बाद उनकी पत्नी मालिनी ने पुत्र को जन्म दिया था। हालांकि, वह मृत पैदा हुआ था।

ऐसे में श्मशान में जब पुत्र वियोग में राजा प्रियंवद भी अपने प्राण त्यागने जा रहे थे तो भगवान की मानस पुत्री देवसेना ने तब प्रकट होकर अपना नाम उन्हें षष्ठी बताया था और राजा से उनकी पूजा करने के लिए कहा था। यही नहीं, बाकी लोगों को भी उन्होंने यह व्रत करने के लिए प्रेरित करने के लिए कहा था। देवी षष्ठी का व्रत करने से राजा को संतान की प्राप्ति हुई थी। बस तभी से कार्तिक शुक्ल षष्ठी को यह पूजा होने लगी।

महाभारत की कथा

महाभारत के दौरान भी छठ पूजा का जिक्र मिलता है। बताया जाता है कि भगवान सूर्य के पुत्र कर्ण उनके बहुत बड़े भक्त थे। पानी में खड़े होकर वे भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे। यही वजह रही कि वे एक महान योद्धा भी बने थे। तब से परंपरा यही चली आ रही है और छठ पूजा के दौरान अर्घ्य दिया जाता रहा है।

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