मैडम तुसाद स्टेडियम में अपने मोम के पुतले के सामने मिल्खा। File Photo

स्वतंत्र भारत के पहले स्पोर्ट‍्स सुपरस्टार मिल्खा सिंह नहीं रहे : 91 की उम्र में कोरोना से हारे

New Delhi : मिल्खा सिंह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 1960 में रोम ओलंपिक में 0.1 सेकंड से कांस्य पदक चूक गये। यह भारत का सबसे बड़ा ट्रैक और फील्ड पदक हो सकता था लेकिन नहीं हुआ और पूरे देश ने पहली बार एकसाथ दिल टूटने का एहसास किया। एक सेना का आदमी, जिसने पाकिस्तान के एक जनरल को इतना प्रभावित किया कि उसने उसे प्रसिद्ध उपनाम “फ्लाइंग सिख” दे दिया। एक ट्रैक लीजेंड जिसने भारत को सबसे बड़े खेल मंच के शुरुआती पंक्ति में खड़ा किया – मिल्खा सिंह का शुक्रवार की देर रात 91 वर्ष की आयु में कोविड से संबंधित जटिलताओं की वजह से निधन हो गया। पांच दिन पहले, मिल्खा की पत्नी, भारत की पूर्व वॉलीबॉल कप्तान, निर्मल कौर, मोहाली के उसी अस्पताल में वायरस से अपनी लड़ाई हार गई थीं, जहां महान धावक ने अंतिम सांस ली।

मिल्खा के परिवार में 14 बार के अंतरराष्ट्रीय विजेता और गोल्फर बेटे जीव मिल्खा सिंह, बेटियां मोना सिंह, सोनिया सिंह और अलीजा ग्रोवर हैं। एशियाई खेलों में उनके चार स्वर्ण पदक और पाकिस्तान के अब्दुल खालिक के साथ फेमस द्वंद्व ने स्टेडियमों को रोशन किया। मिल्खा की एक और प्रसिद्ध जीत ब्रिटेन के कार्डिफ में तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य और राष्ट्रमंडल खेलों में उनका ऐतिहासिक 400 मीटर में स्वर्ण पदक था। 70,000 से अधिक प्रशंसकों के सामने कार्डिफ आर्म्स पार्क में सबसे बाहरी लेन में दौड़ते हुये, मिल्खा ने तत्कालीन विश्व रिकॉर्ड धारक, दक्षिण अफ्रीका के मैल्कॉम स्पेंस को पीछे छोड़ते हुये, इतिहास बनाने के लिये 46.6 सेकंड का समय लिया और महारानी एलिजाबेथ से अपना पदक प्राप्त किया। दौड़ के बाद जैसा कि उन्होंने बीबीसी को बताया- मैंने अपनी मातृभूमि के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर लिया है।
विभाजन के दौरान दंगों के बाद अपने माता-पिता और तीन भाइयों के साथ मिल्खा फिरोजपुर पहुंचे। वे सैनिकों के जूते चमकाते और बुरे दिनों में अपने खाली पेट को भरने के लिये राशन चोरी करने को मजबूर हो गये। सेना में भर्ती के दो असफल प्रयासों के बाद, मिल्खा ईएमई, सिकंदराबाद में शामिल हो गये। मिल्खा ने इंटर-सर्विसेज मीट प्रतिस्पर्धा में भाग लिया। 1956 में मिल्खा ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुये 400 मीटर के अपने सफलता के सफर की शुरुआत करते हुये मेलबर्न ओलंपिक के लिये जगह बना ली। मिल्खा ने राष्ट्रीय रिकॉर्ड स्थापित करना शुरू कर दिया।
वे जल्द ही एशिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बन गये। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने लाहौर में एक अंतरराष्ट्रीय दौड़ में अब्दुल खालिक को पछाड़ने के बाद मिल्खा को “फ्लाइंग सिख” का नाम दिया था। ओलिंपिक में भी उनकी नाकामी महाकाव्य की तरह थी। एक रेस में जहां यूएसए के ओटिस डेविस ने जर्मनी के कार्ल कॉफमैन के साथ 44.9 सेकंड का विश्व रिकॉर्ड बनाया, वहीं मिल्खा ने 45.6 सेकंड का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि बीच के चरण में पीछे मुड़कर देखने से उनका कीमती समय बर्बाद हो गया था। उन्होंने परिणाम को भाग्य के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया उसके लिये मिल्खा हमेशा आभारी थे, न कि जो उन्होंने खोया उस पर उदास रहने के।

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