क्या बिहार में भाजपा को नुकसान की आशंका, टलवाना चाहती है चुनाव? पढ़ें ये विश्लेषण

पटना
क्या बिहार के विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान की आशंका सता रही है? क्या बिहार में भाजपा ने कोई आतंरिक सर्वे कराया है? क्या भाजपा को इस बात का डर है कि उसको वोटर बाहर नहीं निकलेंगे? क्या भाजपा बिहार में राष्ट्रपति शासन के पक्ष में है? क्या भाजपा बिहार में इस अपना सीएम चाहती है? ये बड़े-बड़े सवाल हम पूछ नहीं रहे बल्कि सोशल मीडिया पर एक वरिष्ठ पत्रकार के लेख को पढ़ने के बाद ये सवाल खड़े हो रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सोनी ने बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर कई बातें शेयर करते हुए अपने फेसबुक प्रोफाइल पर एक लंबा लेख लिखा है। हम अपने पाठकों के लिए भी लो लेख लेकर आए हैं। यहां से नीचे आप जो पढ़ेंगे वो शिशिर सोनी का लेख है, हमारी तरफ से साभार:

भाजपा ने आंतरिक सर्वे कराया है। उसमें इस बात का साफ जिक्र है कि बिहार चुनाव तय समय पर, नवंबर में हुए तो भाजपा के चालीस फीसदी मतदाता कोरोना के डर से वोट डालने नहीं निकलेंगे। पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

दूसरा जिक्र इस बात का भी है कि तकरीबन चालीस लाख मजदूर बिहार लौटे हैं। सभी छठ पर्व तक बिहार में ही रहेंगे। उनमें से एक बड़े वर्ग में विभिन्न कारणों से नितीश सरकार के खिलाफ भारी नाराज़गी है। ये सभी वोटर छठ के बाद धीरे धीरे कामकाज के लिए फिर बिहार छोड़ेंगे। इसलिए सुझाव दिया गया है – अच्छा होगा कि बिहार चुनाव अभी टाला जाए। छः सात महीने बाद बंगाल, असम के साथ चुनाव कराया जाए। तब तक कोरोना काल कुछ मद्धिम होगा। टीके भी आ जायेंगे। गुस्से से भरे मजदूर बिहार छोड़ देंगे। वोटर वोट डालने खुल कर निकल सकेंगे।

 

भाजपा रणनीतिकारों की कोशिश है कि नवंबर के बाद बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। दिल्ली के हिसाब से डीएम, एसपी की नियुक्ति हो फिर उन्ही की देखरेख में बिहार विधानसभा का चुनाव हो। जिसमें भाजपा का अपर-हैंड हो। भाजपा में नेताओं का एक बड़ा हिस्सा है जो चाहता है, बिहार में इस बार भाजपा का सीएम बने। भले ही घोषणा नितीश कुमार की कर दी गई हो। पर राजनीति में जो दिखता है वो असल में कई बार सच नहीं होता। सो, भीतरखाने कई तरह के शीर्षासन चल रहे हैं।

भाजपा के इस पैंतरे को नितीश कुमार समझ रहे हैं। वो समय पर चुनाव चाहते हैं। उन्हें इस बात का इल्म है कि अभी तो उनकी वापसी के कुछ चांस भी हैं, छः महीने बाद उनकी स्थिति बदतर हो जायेगी। पकड़ ढीली पड़ जायेगी। यही वजह है वे अड़े हैं। उनकी दलील है कि वोटिंग इस बार अगर कम होगा तो उसकी ज़द में सभी दल आयेंगे। केवल भाजपा या जदयू को नुकसान नहीं होगा राजद, कांग्रेस सहित अन्य दलों के भी वोटर समान रूप से कम होंगे। नितीश का मानना है कि चुनाव में वोटिंग कम होने का मतलब है सत्ताधारी दलों को फ़ायदा। वोटिंग परसेंटेज कम होगा जो उनके लिए वरदान साबित होगा। गठबंधन फिर सत्तासीन होगा।

जमीनी हकीकत ये है कि भाजपा, जदयू के वोटर छोड़िये नेता भी सड़कों पर नहीं दिख रहे। जबकि राजद अपने दल, बल के साथ सड़कों पर है। उसके आक्रामक वोटर यादव और मुसलमान सड़कों पर हैं। नवंबर में चुनाव हुआ तो वोटिंग में निश्चित रूप से विपक्ष को फ़ायदा होगा। विपक्ष का वोटिंग शेयर बढ़ेगा। बढ़ा हुआ वोट शेयर अगर सीटों में परिणत हो गया तो जदयू, भाजपा और लोजपा गठबंधन मुश्किल में होगा। तब नये समीकरण बनेंगे।

तमाम बैठकों और चुनावी तैयारियों के बीच इस सम्भावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि बिहार में तय समय पर चुनाव न हो। उसे टाला जाए। राष्ट्रपति शासन लगे। नये बिसात पर नये मोहरें सजाये जाएं। नई जुगलबंदी हो।

नोट: इस लेख को यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सोनी के लिखे इस लेख को उनके फेसबुक वॉल पर यहां क्लिक कर भी पढ़ा जा सकता है।

भाजपा ने आंतरिक सर्वे कराया है। उसमें इस बात का साफ जिक्र है कि बिहार चुनाव तय समय पर, नवंबर में हुए तो भाजपा के चालीस…

Posted by Shishir Soni on Wednesday, September 2, 2020

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