JNU की पढ़ाई आई काम, बिहार का नौजवान जा पहुंचा जापान, बनाई करोड़ों की कंपनी

पटना
भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि सपने हमेशा बड़े देखने चाहिए। सपने देखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उन्हें साकार करने की दिशा में मेहनत करना भी है। बिहार के अतुल पासवान जो कि एक दलित उद्यमी हैं, उन्होंने आज अपनी पहचान एक ऐसे उद्यमी के रूप में बना ली है, जो आज बहुतों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। अपनी खुद की आईटी कंपनी शुरू करने वाले अतुल पासवान की पहचान आज एक सफल उद्यमी के रूप में है। अतुल की कहानी बिहार टू जापान की है, जिसकी नींव देश की मशहूर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानी JNU में पड़ी। वही जेएनयू जहां से कन्हैया कुमार पढ़े हैं और जिसे कुछ मीडिया चैनल और राजनीतिक दल देशद्रोही बताते रहते हैं। खैर, हमको राजनीति से क्या, आप तो जेएनयू से निकल जापान में छा गए बिहार के इस नौजवान की कहानी जानिए।

मेढक को चीरता देख उड़े होश, तब छोड़ा डॉक्टर बनने का सपना

ATUL PASWAN FOUNDER OF INDO SAKURA – Amit Kumar Sachin

वैसे तो अतुल बनना तो एक डॉक्टर चाहते थे, लेकिन जब उन्होंने एक मेंढक की चीर-फाड़ होते हुए देखा था, तो बेहोश हो गए थे। फिर तो उन्होंने डॉक्टर बनने का इरादा ही त्याग दिया। बिहार के सिवान जिले के रहने वाले अतुल पासवान ने इसके बाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में फॉरेन लैंग्वेज में डिग्री कोर्स में एडमिशन पा लिया। जापानी भाषा की पढ़ाई उन्हें करनी थी। अंग्रेजी आती नहीं थी, क्योंकि अब तक की पढ़ाई हिंदी में हुई थी। फिर भी दक्षिण भारतीय स्टूडेंट्स से उन्होंने अंग्रेजी सीखी और इस वजह से जापानी भाषा की पढ़ाई पूरी करना उनके लिए आसान हो गया। उन्होंने एमबीए भी पांडिचेरी यूनिवर्सिटी से पूरा कर लिया।

जापान की ओर झुकाव

बिहार (Siwaan, Bihar) के छोटे कस्बे से अंतर्राष्ट्रीय कंपनी तक का सफ़र: अतुल  पासवान (Atul Paswan) उन्होंने लीक से हटकर चलने का फैसला लिया और उद्यमी बने  ...

सॉफ्टवेयर की तरफ एमबीए की पढ़ाई के दौरान वे आकर्षित होने लगे थे। हालांकि, उन्हें मालूम था कि बिना डिग्री के यह एक मुश्किल काम होगा। उन्होंने सोचा कि क्यों न जापान में इस दिशा में कुछ किया जाए। अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में भारत की सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री खूब चल रही थी, क्योंकि वहां की भाषा अंग्रेजी थी। जापान में कुछ करने के लिए जापानी भाषा की समझ होनी जरूरी थी।

शुरू की कंपनी

आखिरकार इंडो सकुरा, जो कि जापान में एक फूल का नाम है, इस नाम से उन्होंने वर्ष 2005 के अंत तक एक सॉफ्टवेयर कंपनी वहां शुरू कर दी। जापान की कंपनी ओमरान के साथ उन्होंने टाई-अप कर लिया। इसके तहत इंजीनियरों को जापानी भाषा की अच्छी ट्रेनिंग दी जाने लगी और दोनों कंपनियों ने इन्हें आधा-आधा बांटना शुरू कर दिया।

वो कठिन साल

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चल तो सब कुछ ठीक से ही रहा था, लेकिन वर्ष 2008 में क्लाइंट को जैसा सॉफ्टवेयर चाहिए था, वैसा उनकी कंपनी के इंजीनियरों की गलती की वजह से नहीं बन पाया। कोर्ट तक बात पहुंचने की नौबत आ गई थी, मगर अपना प्रॉफिट छोड़ते हुए अतुल को किसी तरीके से समझौता करना पड़ा था।

आर्थिक तौर पर नुकसान तो बहुत हुआ था। निराशा भी बहुत हाथ लगी थी, मगर फिर भी उन्होंने फिर से अपनी कंपनी को खड़ा किया और वर्ष 2011-12 तक कंपनी के टर्नओवर को 20 करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया।

सुनामी के वक्त

अपने पिता के निधन से कुछ दिन पहले वर्ष 2011 में अतुल बिहार आए हुए थे कि उसी दौरान जापान में सुनामी की वजह से बहुत कुछ तबाह हो गया। जापान में न्यूक्लियर प्लांट के रेडिएशन के राजधानी टोक्यो तक पहुंचने का अंदेशा जताया जा रहा था। किसी तरीके से अपनी मां को मना कर अतुल टोक्यो लौटे तो जरूर, लेकिन सारे इंजीनियर काम छोड़कर भारत लौट गए थे। इंडो सकुरा पर अब जापानी कंपनियां विश्वास नहीं कर रही थीं और कंपनी का टर्नओवर तक आधा हो गया था।

हेल्थकेयर क्षेत्र में

Company Profile - Indo-Sakura

ऐसे में सॉफ्टवेयर कंपनी के अलावा भी कुछ करने की सोच कर उन्होंने हेल्थकेयर कंसलटेंसी शुरू कर दी और वर्तमान में करीब 1500 जापानी कंपनियों के लगभग 50 हजार जापानी कर्मचारियों को वे हेल्थ सर्विस भेज रहे हैं। केवल एक फोन पर उन्हें मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराने वाले अतुल का टर्नओवर का अब करीब 10 फ़ीसदी इसी बिजनेस से आ रहा है। वहीं, इंडो सकुरा का टर्नओवर अब सालाना 15 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

अतुल हालांकि यह बताते हैं कि एक दलित होने की वजह से उन्हें जापान में तो किसी तरह के भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा, मगर भारत में जरूर एक कंपनी ने उन्हें काम देने से इनकार कर दिया था। फिर भी अतुल का कहना है कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, क्योंकि काबिलियत के कारण उन्हें ढेरों अवसर मिले हैं।

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