कुणाल बोले- महावीर मंदिर पर हनुमानगढ़ी के अधिकार का दावा बेकार, दलित पुजारी को हटाया गया

Patna : पटना के महावीर मंदिर पर अयोध्या के हनुमानगढ़ी ने अपना अधिकार ठोंका। अयोध्या में राम रसोई के चर्चित और सफल होने के बाद हनुमानगढ़ी महावीर मंदिर पर अपने अधिकार को लेकर कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गया है। लेकिन उसे पता ही नहीं कि यहां कमान आचार्य किशोर कुणाल के हाथ में है। हालांकि महावीर मंदिर को अपने नियंत्रण में लेने के लिये हनुमानगढ़ी अयोध्या में हस्ताक्षर अभियान चला रहा है। लेकिन महावीर मंदिर न्यास के सचिव आचार्य किशोर कुणाल ने स्पष्ट किया है कि पटना के महावीर मंदिर का अयोध्या के हनुमानगढ़ी से कोई वास्ता ही नहीं है। उन्होंने कहा- हम अपनी श्रद‍्धा और आस्था की वजह से अयोध्या में लोक सेवा का काम कर रहे हैं। वहां पर राम रसोई सिर्फ श्रदधापूर्वक ही चलाया जा रहा है। लोगों को यह काफी पसंद भी आ रहा है। महावीर मंदिर द्वारा अयोध्या में संचालित राम रसोई की लोकप्रियता राष्ट्रीय स्तर पर है। रामनवमी पर पटना से ही नैवेद्यम लड्‌डू भेजा जाता है।

आचार्य बोले- राम लला के भोग के लिये गोविंद भोग चावल भी महावीर मंदिर की ओर से ही व्यवस्था कराई जाती है। वहां पर आनेवाले श्रदधालुओं की जरूरतों को देखते हुये 200 लॉकर की नि:शुल्क सुविधा उपलब्ध कराई गई है। मीडिया से बात करते हुये आचार्य किशोर कुणाल ने कहा – पटना के महावीर मंदिर का इतिहास और कानूनी स्थिति की जानकारी हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन महंत प्रेम दास एवं बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद् के अध्यक्ष को पहले ही दे दी गई थी। रामानंद संप्रदाय के 500 साल के इतिहास में पहली बार रामावत संगत का सम्मेलन 11 अक्टूबर 2014 को श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल पटना में हुआ, जिसमें रामानंदाचार्य के सभी द्वादश शिष्यों के आश्रम से धर्माचार्य/ प्रतिनिधि उपस्थित हुये। सम्मेलन में घोषणा हुई कि रामानन्दाचार्य जी द्वारा स्थापित संस्था का नाम रामावत संगत था, जिमसें अनन्ताचार्य जी कबीर पन्थ, रविदास पन्थ, सेन नाईं, धन्ना जाट आदि सभी पन्थों के धर्माचार्य उपस्थित थे। महावीर मंदिर उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। यह हनुमानगढ़ी से स्वतंत्र एक पृथक धार्मिक संस्था है।
महावीर मंदिर पटना उच्च न्यायालय के आदेश से सार्वजनिक मंदिर है। 1935 से इसका संचालन न्यास समिति के जरिये ही होता आ रहा है। 1956 में धार्मिक न्यास पर्षद और महावीर मंदिर न्यास समिति के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके अनुसार न्यास समिति जब तक मंदिर का आर्थिक विकास करती रहेगी, न्यास पर्षद इसके संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेगी। 1958 में पटना उच्च न्यायालय ने इस समझौते को स्वीकृति दी थी। 1990 में धार्मिक न्यास पर्षद् ने इसके संचालन के लिये एक विस्तृत योजना बनायी थी। इसके अनुरूप इी इसका संचालन होता है।
इधर अयोध्या के गुरु रविदास मंदिर की अनुशंसा पर पटना महावीर मंदिर के पहले दलित पुजारी फलहारी सूर्यवंशी दास हटा दिये गये हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1993 में आचार्य किशोर कुणाल के अनुरोध पर ही गुरु रविदास मंदिर से फलहारी दास को पटना भेजा गया था। उनकी नियुक्ति पूरे देश में काफी प्रचारित हुई थी। गुरू रविदास मंदिर अयोध्या द्वारा फलहारी सूर्यवंशी दास के बारे में भेजे गये पत्र में उनके आचरण पर सवालिया निशान लगाया गया है। बताया गया है कि फलाहारी सूर्यवंशी दास के विरूद्ध अनेक शिकायतें मिली हैं। इन शिकायतों में संप्रदाय की मर्यादा के हनन और निरंतर असत्य भाषण की चर्चा है। आरोप प्रमाणित भी हो चुके हैं। जिसके बाद उन्हें चेतावनी दी गई। पर उनके आचरण में कोई बदलाव नहीं आया। ऐसी स्थिति में उन्हें हटाने की अनुशंसा की गई। इसके बाद उन्हें महावीर मंदिर पटना के पुजारी पद से हटा दिया गया है। उनकी जगह मंदिर के आचार्य अवधेश दास को महावीर मंदिर का नया पुजारी नियुक्त किया गया है।

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