बैंक की 11 लाख की नौकरी छोड़ लौटा बिहार, खेती से कमाने लगा 20 लाख, उपजाते हैं ये चीजें

पटना
अगर आपकी वार्षिक सैलरी 11 लाख रुपये हो तो आप भारत के उच्च मध्यम वर्ग में शामिल माने जाएंगे। सालाना 11 लाख का मतलब होता है हर महीने 90 हजार रुपये से अधिक की सैलरी। और अगर ये सैलरी आपको 2011 में मिल रही हो तो आज के हिसाब से आप इसे 2 लाख रुपये प्रति महीने तो मोटा-मोटी मान ही सकते हैं। अब जिसकी सैलरी इतनी हो क्या वो नौकरी छोड़कर खेती की ओर लौटेगा? आपका जवाब शायद ना हो। लेकिन जिसे अपनी मिट्टी से प्यार होता है और जो अपने समाज के लिए कुछ करना चाहता है, वो घर वापसी तो जरूर करता है। और वैसे भी नौकरी कोई आजादी वाला काम तो है नहीं, सैलरी चाहे जितनी हो मन के मालिक तो आप नहीं ही होते। ऐसी ही एक कहानी औरंगाबाद के अभिषेक की है। ये कहानी वो मिसाल है जो बताती है की धरती माता से अगर प्यार किया जाए तो नौकरी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। पर अभिषेक ने ये काम धान गेहूं उपजा कर नहीं किया, उन्होंने क्या उपजाया आप इसी खबर में जानेंगे।

बैंक की 11 लाख ली नौकरी छोड़ी

अभिषेक औरंगाबाद के बरौली गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने 2007 में पुणे से मैनेजमेंट की पढ़ाई की थी। 2007 में ही उन्होंने hdfc बैंक से नौकरी शुरू की और पैकेज मिला 7 लाख रुपये सालाना का। 2007 में 7 लाख की रकम काफी हुआ करती थी। आज भी बिहार की एक बड़ी आबादी के लिए इतनी कमाई एक सपना है। 2011 तक उनका पैकेज बढ़कर 11 लाख रुपये तक पहुंच गया। अभिषेक पुणे में काफी ऐसे बिहारी लोगों से मिले जो गार्ड वगैरह की नौकरी कर थोड़े पैसे कमा रहे थे जबकि उनके अपने बिहार में खेत भी थे। अभिषेक जानते थे कि खेती की पैदावार कम होने और परंपरागत खेती करने की वजह से ही इन लोगों को आज दर दर की ठोकर खानी पड़ रही है। इसी दौरान अभिषेक ने महाराष्ट्र में फूलों की खेती को करीब से देखा। महाराष्ट्र के ये किसान किसी भी नौकरी वाले से ज्यादा खुशहाल थे और सबसे बड़ी बात की वो ये कमाई अपने घर अपने गांव में कर रहे थे।

मन में मिशन लेकर लौटे बिहार 

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अभिषेक को महाराष्ट्र में जब ये प्रेरणा मिली तो उन्होंने घर यानी बिहार लौटकर खेती करने का मन बना लिया। अभिषेक के इस फैसले पर जहां घर वाले चकित रह गए वहीं, वहीं गांव वालों ने तो मजाक तक उड़ाया। लेकिन अभिषेक तो ठहरे प्रबंधन के विद्यार्थी। बिना तैयारीबव खेती में भी नहीं उतरे थे। अभिषेक ने पहले कृषि विभाग जाकर तमाम योजनाओं की जानकारियां इकट्ठा की। उन्होंने परंपरागत खेती की बजाय एक नया प्रयोग किया। अभिषेक ने 8 कट्ठा खेत मे औषधीय पौधों जैसे जरबेरा, ऑर्किड, लिमियम जैसे पौधों की खेती की। पहले साल उन्हें  करीब 4 लाख रुपये की आमदनी हुई। इससे उनका उत्साह और बढ़ गया। जो लोग उनका मजाक उड़ा रहे थे अब वो भी उनका काम ध्यान से देखने और परखने लगे।

औषधीय पौधे ही क्यों? 

अभिषेक बताते हैं कि एक बार औषधीय पौधे लगाने के बाद 2-3 साल तक की छुट्टी मिल जाती है। इन पौधों की देखरेख आसान होती है और ये खराब मौसम को भी आसानी से झेल जाते हैं। अभिषेक बताते हैं कि अपने यहां जानवर भी खेती को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन जानवर औषधीय पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाते। ऐसे में ये खेती चौतरफा फायदे का ही सौदा है। अभिषेक ने आर्टीमिसिया नामक औषधि की भी खेती की। इससे मलेरिया की दवा बनती है। फिलहालअभिषेक बिहार के अन्य जिलों के किसानों के साथ मिलकर फूलों व औषधि की खेती कर रहे हैं।

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बनाई एग्रो कंपनी, फूलों रजनीगंधा की खेती से संवारा भविष्य

अभिषेक औषधीय पौधों के अलावा फूलों की भी खेती करते करवाते हैं। खासकर रजनीगंधा की खेती। अभिषेक के मुताबिक एक हेक्टेयर में इसकी।खेती की लागत करीब डेढ़ लाख रुपये आती है। करीब दो लाख फूल बल्ब तैयार होते हैं। इनसे औसतन एक साल में 5 लाख की आमदनी होती है। अभिषेक ने औरंगाबाद कादम्बिनी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी शुरू की। आज उनके नेटवर्क से 2 लाख से अधिक किसान जुड़ गए हैं। अभिषेक को 2014 में बिहार के श्रेष्ठ किसान का पुरस्कार मिल चुका है। 2016 में PM मोदी उन्हें कृषि रत्न पुरस्कार भी दे चुके हैं।

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