MBA के बाद लाखों की नौकरी छोड़ लौटे बिहार, 12 बीघे में की ऐसी खेती कि बरसने लगा धन

पटना

एक वक्त था जब कृषि प्रधान हमारे देश में नौकरी को बेहतर नहीं समझा जाता था। लोग कहते कि दूसरों की चाकरी करने से अच्छी है खुद की खेती। ऐसे ही भारतीय समाज को देख तब कवि घाघ ने लिखा होगा कि उत्तम खेती माध्यम बान निखद चाकरी भीख सामान। यानी चाकरी तो भीख के जैसी है। सबसे उत्तम काम खेती है। लेकिन वक्त गुजरा, भारत भी बदला। लोग नौकरियों के चक्कर में महानगरों को दौड़े। दिन-रात का चैन गंवा कुछ हजार लाख रुपये मिले वो भी बीमारी और कर्ज की किस्तों के साथ। अभी कोरोना महामारी ने नौकरी के इस छलावे को भी ध्वस्त कर दिया। महानगरों में लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार हुआ, जिनमें बड़ा हिस्सा बिहारी नौजवानों का है। इस अंधेरे समय में ऐसी भी कहानियां हैं जो आपको हौसला देती हैं। बताती हैं कि नौकरी ही एक रास्ता नहीं। ऐसी ही कहानी है औरंगाबाद के पिपरा गांव के अनिल कुमार की।

बड़ी-बड़ी कंपनियों को छोड़ बिहार लौटे

अनिल कुमार ने एमबीए करने के बाद कई बड़ी कंपनियों में काम किया। उन्हें महाराष्ट्र के कॉर्पोरेट जगत में अच्छी खासी सैलरी मिल रही थी। लेकिन जीवन में न तो सुकून था और न ही समय। लेकिन बिहार की माटी के इस लाल को हमेशा से खेती आकर्षित करती रहती थी। अनिल कुमार के पास 12 बीघे की खेती थी। 2012 में औरंगाबाद आने पर उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र के अफसरों से मुलाकात की। खेती को लेकर उनकी रुचि देखी गई। उस समय 12 बीघे की जमीन से सवा लाख से डेढ़ लाख तक की वार्षिक आमदनी होती थी। इस आमदनी के भरोसे अनिल कुमार कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर बिहार नहीं लौट सकते थे। इतने कम पैसों से परिवार का गुजारा अच्छे से संभव नहीं था।

समेकित कृषि प्रणाली ने दिखाया रास्ता

कृषि वैज्ञानिकों ने अनिल कुमार को समेकित खेती का सुझाव दिया। लेकिन रास्ता अभी भी मुश्किल था। घर पर कोई इस बात को लेकर तैयार नहीं हो रहा था कि एक एमबीए किया हुआ शख्स खेती में अपना भाग्य आजमाए। लेकिन अनिल को लगता है कि भविष्य में नौकरियों के सामने आने वाले संकट का मानों पूर्वाभास हो चुका था। वो अपने जुनून को लेकर अड़े रहे। वो रुकने वाले नहीं थे, फैसले पर अडिग रहे। फिर उन्होंने वो कर दिखाया कि आज लोग अनिल कुमार की मिसाल दे रहे हैं।

पहले तालाब कटवाया गया

पहले एक हेक्टेअर क्षेत्रफल में तालाब की कटाई करवाई गई। ये कटाई भी जिला मत्स्य पालन केंद्र, औरंगाबाद के सहयोग से की गई। इस तालाब में मछली पालन का काम शुरू किया गया। इसके बाद जिला गव्य विकास कार्यालय औरंगाबाद के सहयोग से 20 गायों को लेकर डेयरी फार्म शुरू किया गया। अनिल कुमार ने मछली पालन, पशु पालन, सब्जी और हल्दी की खेती समेकित कृषि प्रणाली के तहत की। आज अनिल के पास 45 गायों से अधिक की डेयरी है। गोबर से केचुआ खाद बना जैविक खेती की जा रही है। आज परिवार को भी उनकी इस सफलता पर गर्व है।

आमदनी रॉकेट की रफ्तार में बढ़ी

ऊपर हम आपको बता चुके हैं कि समेकित खेती से पहले 12 बीघे के खेत से अनिल कुमार को सालाना डेढ़ लाख तक ही आमदनी होती थी। अब आप जरा कल्पना कीजिए कि समेकित खेती के बाद ये आमदनी कितनी हो गई होगी। आपने चाहे जो अंदाजा लगाया हो, हम आपको अब सच बता ही देते हैं। 2013-14 में ये आमदनी 16-17 लाख तक पहुंच गई। 2014-15 में 17.5 लाख, 2015-16 में 18.5 लाख और 2016-17 में ये आमदनी 20 लाख रुपये सालाना के आंकड़े को पार कर गई। यानी अपना काम करके अनिल कुमार ने सैलरी वाली जॉब को न केवल पछाड़ दिया बल्कि दर्जनों लोगों को रोजगार देने वाले भी बन गए।

सैकड़ों किसान भी हो रहे लाभान्वित

अनिल कुमार के प्रयासों से मछली उत्पादन केंद्र का गठन हुआ है। डेढ़ सौ से अधिक किसान इससे जुड़े हैं। उन्होंने किसानों के समूह के उत्पाद को ध्यान में रखते हुए नाबार्ड रूरल मार्ट की स्थापना की। यहां दूध, सब्जी, मशरूम, पापड़, इत्यादि कृषि उत्पादों की बिक्री की जाती है। इसके अलावा डेयरी प्रोडक्ट की भी बिक्री की जाती है। अनिल कुमार ने प्रबंधन के अपने कौशल को खेती में ऐसे आजमाया कि आसपास की सैकड़ों की संख्या में लोगों के दिन बहुर गए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *