बिहार में चुनाव से पहले ही टूट जाएंगे NDA और महागठबंधन? संकेत तो कुछ ऐसे ही हैं

पटना
बिहार विधानसभा चुनाव एकदम सिर पर हैं लेकिन राजनीतिक दल अबतक कुछ भी फाइनल नहीं कर पाए हैं। गठबंधन की बात करें तो एनडीए और महागठबंधन, दोनों का ही हाल एक जैसा ही नजर आ रहा है। दोनों ही खेमे से इस वक्त बिहार की राजनीति को लेकर एक बड़ी सुगबुगाहट देखने को मिल रही है। एक तरफ एनडीए में पुरानी दोस्तियां दांव पर लगी हुई हैं तो दूसरी तरफ महागठबंधन के नए साथियों के रुख में भी बगावत दिख रही है। दोनों जगहों पर सीट शेयरिंग को लेकर मामला फंसा हुआ है। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि अब ये मामला उस मोड़ पर पहुंच रहा है, जहां से कुछ मुमकिन है। आइए आपको हालिया विवाद और इस वजह से उपजे नए राजनीतिक हालातों पर विस्तार से बताते हैं।

शुरू करते हैं एनडीए से। एनडीए में चिराग पासवान अब जल्द ही कोई बड़ा फैसला कर सकते हैं। खबरों के मुताबिक भाजपा ने भी चिराग पासवन को 25 से अधिक सीटें नहीं देने का मन बना लिया है। यानी भाजपा और जदयू एक प्लेटफॉर्म पर आते दिख रहे हैं। पर चिराग इतने कम पर तैयार नहीं हैं। लोजपा पहले भी संकेद दे चुकी है कि पार्टी ने 143 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रखी है। चिराग के साथ मसला केवल सीटों की संख्या को लेकर ही नहीं बल्कि मनपसंद सीटों को लेकर भी है। संशय के बादल इतने गहरे हैं कि लोग संभावना जताने लगे हैं कि चिराग अकेले भी चुनावी मैदान में उतर सकते हैं।

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उधर महागठबंधन के साथ नजर आ रहे रालोसपा चीफ उपेंद्र कुशवाहा के तेवर भी अब बागी हैं। उपेंद्र कुशवाहा ने पार्टी की राष्ट्रीय और प्रदेश कार्यकारिणी की आपात बैठक बुला ली है। पार्टी के नेता खुले तौर पर कह रहे हैं कि सीटों के बंटवारे को लेकर राजद और कांग्रेस की नीयत ठीक नहीं दिख रही है। उधर रालोसपा के तीखे तेवर देख एनडीए भी मौका भुना रहा है। उधर से भी नेता उपेंद्र कुशवाहा के लिए वेलकम मैसेज होने की बात कह रहे हैं। अभी पिछले दिनों जीतनराम मांझी महागठबंधन का साथ छोड़ एनडीए का दामन थाम चुके हैं। ऐसे में अगर उपेंद्र कुशवाहा ने भी अलग राह अपनाई तो यह महागठबंधन के लिए चुनाव पूर्व ही ब़़ड़ा झटका होगा।

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मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक रालोसपा 35 सीटों की मांग कर रही है लेकिन राजद 10-12 सीटों से आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही। रालोसपा की तरफ से तो उपेंद्र कुशवाहा को ही सीएम का चेहरा भी बताया जा रहा है। ऐसे में ये लड़ाई कहां जाकर ठहरेगी, इसका अभी कोई अंदाजा लगाना काफी मुश्किल नजर आ रहा है। लेकिन इतना तो तय है कि दोनों गठबंधनों में अंदरखाने गड़बड़ चल रही है। यही वजह है कि सार्वजनिक तौर पर भी चल रही आपसी बयानबाजी पर रोक लगाने की कोशिश भी नजर नहीं आ रही है।

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