आखिरी चिट्ठी लिख अलविदा कह गए रघुवंश बाबू, बिहार का लाल हमेशा के लिए सो गया

पटना
बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। देश में अब कुछ ही तो समाजवादी परंपरा के नेता बचे थे, उनमें से भी एक रघुवंश बाबू का राजनीतिक नेतृत्व अब बिहार और देशवासियों को देखने को नहीं मिलेगा। आजीवन राजनीति में सक्रिय रहने वाले रघुवंश प्रसाद ने दिल्ली के एम्स में आखिरी सांसें लीं। कोरोना संक्रमित होने के बाद उनकी तबीयत जो गड़बड़ हुई फिर ठीक नहीं हो सकी। पटना में इलाज कराने के बाद उन्हें पिछले दिनों दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया था। ऐसा लगता है कि मानों रघुवंश बाबू को अपनी आखिरी घड़ी का अंदाजा हो गया था।

अस्पताल के बिस्तर से उन्होंने दो खत लिखे जिनमें केवल इमोशन थे। वैसे भी कहते हैं कि आखिरी घड़ी में भावनाएं हावी हो जाती हैं। रघुवंश प्रसाद सिंह को 4 अगस्त को ही एम्स में भर्ती कराया गया था। शनिवार को खबर आई कि वो वेंटिलेटर पर हैं और रविवार को मनहूस खबर सामने आ गई। 10 सितंबर को उन्होंने एक साधारण से कागज पर लालू को संबोधित करते हुए चिट्ठी लिखी थी और उनका साथ छोड़ने का भावुक ऐलान किया था। तब रघुवंश बाबू ने लिखा था कि, ‘जननायक कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद 32 वर्षों तक आपके पीछे-पीछे खड़ा रहा, लेकिन अब नहीं। पार्टी नेता, कार्यकर्ता और आमजनों ने बड़ा स्नेह दिया। मुझे क्षमा करें।’

लालू के रोके नहीं रुके, हमेशा के लिए चले गए रघुवंश बाबू

हालांकि इसके बाद लालू प्रसाद यादव ने भी उनके जवाब में चिट्ठी लिखी थी। ये चिट्ठी भी काफी वायरल हुई थी। लालू ने लिखा था, ‘प्रिय रघुवंश बाबू, आपके द्वारा कथित तौर पर लिखित एक चिट्ठी मीडिया में चलाई जा रही है, मुझे तो विश्वास ही नहीं होता।’ लालू ने लिखा कि मेरे आपके द्वारा सिंचित राजद परिवार शिघ्र ही आपको स्वस्थ होकर अपने बीच में देखना चाहता है। चार दशकों में हमने हर राजनीतिक, सामाजिक और यहां तक की पारिवारिक मामलों में मिल बैठकर ही विचार किया है। आप जल्द स्वस्थ हों, फिर बैठ कर बात करेंगे। आप कहीं नहीं जा रहे हैं। समझ लीजिए। आपका लालू प्रसाद।’ पर शायद राजद सुप्रीमो को इस बात का अंदाजा नहीं था कि दोस्त इतना रूठ चुका है कि हमेशा के लिए न केवल उनसे बल्कि सबसे दूर चला जाएगा।

बिहार की राजनीति के अजातशत्रु थे रघुवंश बाबू

रघुवंश प्रसाद सिंह की पहचान बिहार के टॉप के समाजवादी नेताओं में से एक थी। उन्हें बिहार की राजनीति का अजातशत्रु माना जाता है। राजनीति में शायद ही ऐसा कोई हो, जिससे रघुवंश बाबू की दुश्मनी हो। अपने पूरे पोलिटिकल करियर में रघुवंश प्रसाद सिंह विरोधियों के भी पसंदीदा नेता बने रहे। रघुवंश प्रसाद सिंह ने बिहार यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट हासिल किया था। बाद में वो गणित के प्रोफेसर बने और सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज में अध्यापन किया। 1970 में जब वो शिक्षकों के आंदोलन के दौरान जेल गए तब पहली बार जननायक कहे जाने वाले कर्पूरी ठाकुर के संपर्क में आए।

जेपी के आंदोलन में भी रघुवंश प्रसाद सिंह ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आपातकाल के दौरान उनके प्रोफेसरशिप चली गई और कांग्रेस की सरकार में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। इसी दौरान उन्हें मीसा एक्ट में गिरफ्तार भी किया गया। जेल में ही उनकी मुलाकात लालू प्रसाद यादव से हुई। तभी से यह दोस्ती चली जो अंत समय तक कायम रही। रघुवंश प्रसाद सिंह 1977 में बिहार सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे। लोकसभा के सदस्य के रूप में वह पहली बार 1996 में निर्वाचित हुए। 2004 में जब लोकसभा चुनावों में उन्हें जीत मिली तो उन्हें ग्रामीण विकास मंत्रालय भी मिला। एक बार फिर 2009 में वो पांचवीं बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।

रघुवंश प्रसाद सिंह अपने पीछे दो बेटे और एक बेटी को छोड़ गए हैं। इनके परिवार का कोई शख्स फिलहाल राजनीति में सक्रिय नहीं है। बड़े बेटे दिल्ली में इंजीनियर हैं तो छोटे बेटे हॉन्कॉन्ग में। रघुवंश बाबू की बेटी पत्रकार हैं।

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