लीजेंड : लौंडा नाच की विरासत को 80 साल से आगे बढ़ाते रामचंद्र, कभी थके नहीं, रच डाला इतिहास

पटना : गणतंत्र दिवस के मौके पर बिहार से पांच गणमान्य लोगों को पद‍्म पुरस्कार देने की घोषणा की गई। दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और गोवा की पूर्व राज्यपाल दिवंगत मृदुला सिन्हा बिहार से पद्म पुरस्कारों के लिये चुने गए पांच व्यक्तियों में से हैं। पासवान को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। जबकि मृदुला सिन्हा को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके कार्यों के लिये पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा मधुबनी जिले के राठी गांव की मधुबनी पेंट आर्टिस्ट दुलारी देवी और लोक रंगमंच कलाकार रामचंद्र मांझी और डॉ. दिलीप कुमार सिंह को पद‍्म श्री के लिये चुना गया है। इस लिस्ट में 80 वर्षों से लौंडा नाच को आगे बढ़ा रहे रामचंद्र मांझी के नाम ने युवा कलाकारों के लिये नजीर पेश कर दी है।

नाट‍्य प्रस्तुति में अपना सबकुछ झोंक देनेवाले रामचंद्र 12 वर्ष की उम्र से यह काम कर रहे हैं।

पश्चिमी संस्कृति और उनकी जीवन शैली का अनुसरण करना हमारी एक प्रवृत्ति बन गई है। कोई भी संस्कृति की गिरती स्थिति से चिंतित नहीं है। चाहे वह हमारा लोक संगीत हो, साहित्य, जातीयता, स्थानीय भाषा या विरासत स्थल। सभी में क्षरण है। दुर्भाग्य से बिहार इसका अपवाद नहीं है। हमारी संस्कृति के प्रति हमारा ध्यान ही नहीं है। बिहार के अधिकांश लोग तो विभिन्न लोक कला रूपों के बारे में जानते भी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में रामचंद्र मांझी जैसे लोग हमारी विरासत को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
केंद्र सरकार का यह सम्मान हमारी लोक संस्कृति को बचाने के लिये जूझते मांझी को देना पूरे प्रदेश के लिये गर्व की बात है। रामचंद्र मांझी एक लोक रंगमंच कलाकार हैं, जिन्होंने प्रसिद्ध भिखारी ठाकुर (सबसे प्रसिद्ध नाच कलाकार, जिन्होंने एक दर्जन नाटक और भोजपुरी में सैकड़ों गीत लिखे हैं) के साथ मंच साझा किया। इससे पहले बिहार के लोक रंगमंच के लिए उनके योगदान के लिए, रामचंद्र मांझी को 2017 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया था।
नाच – जो अक्सर “नृत्य” के साथ भ्रमित होता है, यह बिहार के लोक रंगमंच का अभिन्न अंग है। यह पारंपरिक रूप से अनुसूचित जाति समुदायों के सदस्यों द्वारा सभी पुरुष कलाकारों के साथ किया जाता है। इसे आमतौर पर “लौंडा नाच” के रूप में जाना जाता है।
रामचंद्र मांझी छपरा जिले के एक छोटे से गाँव तुजापुर के हैं। एक दलित परिवार में जन्मे रामचंद्र ने बचपन से ही भिखारी ठाकुर के नाच मंडली के साथ काम करना शुरू किया। उनकी उम्र मात्र 12 साल की थी। और यह यात्रा 80 से अधिक वर्षों से चल रही है। इस लंबी, अविश्वसनीय यात्रा में, उनके प्रदर्शन को मोती लाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, जगजीवन राम, जयप्रकाश नारायण, साथ ही सुरैया, हेलेन, वहीदा रहमान, मीना कुमारी और नौशाद जैसे प्रसिद्ध लोग देख चुके हैं।

इस उम्र में भी रामचंद्र जब महिला का रूप धारण कर मंच पर उतरते हैं तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठता है।

उनके कुछ प्रसिद्ध नाटक बिदेसिया, बेटी बेचावा और गबरघिचोर हैं। ये सभी नाटक भिखारी ठाकुर द्वारा लिखे गए हैं। जिसमें उनके साथ रामचंद्र मांझी छोटे, शिवलाल बाड़ी, और लखी चंद मांझी थे। इन चारों में रामचंद्र मांझी सबसे पुराने हैं। रामचंद्र मांझी जैसे कलाकार, युवा लोक कलाकारों के लिए एक प्रेरणा हैं और एक उम्मीद है कि हमारे सांस्कृतिक प्रतीक बरकरार रहेंगे और हमारे समाज में एक मूल्यवान स्थिति बनी रहेगी।

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