अमेरिका की नौकरी छोड़ लौटे बिहार, 15 लाख टर्नओवर पार कर गया सत्तू का कारोबार, है न गजब!

सत्तू की जब बात होती है तो बिहार का ही नाम जेहन में आता है। सत्तू को बिहार की पहचान भी कहा जाता है। बिहार की संस्कृति का सत्तू एक अहम हिस्सा है। सत्तू को देसी एनर्जी ड्रिंक भी कहा जाता है। विशेष तौर पर यात्रियों और सैनिकों को सत्तू पीते हुए और इसे खाते हुए देखा जाता है। बाजार में भी कई जगहों पर खुले में सत्तू घोलकर बेचते हुए देखा जाता है। सचिन कुमार भी जब इसे देखते थे तो उनके मन में यही आता था कि क्यों न लोगों को एकदम शुद्ध सत्तू उपलब्ध कराया जाए। ऐसे में सचिन कुमार ने कुछ अलग करने की ठान ली।

सालाना टर्नओवर

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उन्होंने सत्तूज के नाम से अपना एक ब्रांड ही बना डाला। अपनी खुद की कंपनी के जरिए उन्होंने शुद्ध सत्तू बेचना शुरू कर दिया। जी हां, सचिन कुमार को इसकी शुरुआत किए केवल एक साल का वक्त ही बीता है और एक ही वर्ष में उनका टर्नओवर 15 लाख रुपये के पार जा चुका है।

नहीं गए अमेरिका

Interview with Sachin Kumar | Sattuz - The IndianPreneur

सचिन कुमार के मुताबिक उनकी पढ़ाई दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में हुई है। एमबीए करने के बाद उन्हें अमेरिका की एक अच्छी कंपनी से जॉब का भी ऑफर आया था। गए भी। पर लौट आये। वे अपने देश में ही रह कर कुछ करना चाहते थे। विशेषकर बिहार की संस्कृति को वे पहचान दिलाना चाहते थे। साथ ही अपना भी वे मुनाफा कमाना चाहते थे।

अपना खुद का ब्रांड

ऐसे में उन्होंने सत्तूज नामक अपना खुद का एक ब्रांड शुरू किया। इसके जरिए उन्होंने शुद्ध सत्तू को बेचना शुरू किया। उन्होंने जब देखा कि उनका सत्तू गुणवत्ता मानकों पर पूरी तरह से खरा उतर गया है तो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अमेजॉन और फ्लिपकार्ट से वे जुड़ गए। यहां उनके प्रोडक्ट अच्छी तरह से बिकने लगे। सचिन कुमार बताते हैं कि उन्होंने अपने सत्तू का सैंपल 10 देशों में भी भेजा है। यही नहीं, बहुत जल्द इंटरनेशनल एयरपोर्ट के साथ रेलवे स्टेशनों पर भी उनके सत्तू मिलने लगेंगे। जल्द ही न्यूयॉर्क में भी इनके सत्तू बिकने वाले हैं।

किया रिसर्च और सर्वे

Sattuz” founded with a vision to make global brands from rural Indian  villages

सचिन कुमार के मुताबिक उन्होंने इसे शुरू करने से पहले अच्छी तरीके से रिसर्च किया। उन्होंने सर्वे भी किया। इसके बाद ब्रांडिंग और पैकेजिंग पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया। लोगों से वे फीडबैक भी इसके बारे में लेते रहे। कई इंटरनेशनल ब्रांड्स को भी वे अपना सत्तू दिखा चुके हैं।

नहीं मानी हार

सचिन बताते हैं कि शुरू में जब उन्होंने इस काम को शुरू किया तो बहुत से लोगों ने उन्हें हतोत्साहित करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यह सब फालतू का काम है। सचिन के मुताबिक उन्होंने इन सब बातों का खुद के ऊपर असर नहीं होने दिया। उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी।

रंग लाई मेहनत

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उनके पास आज 10 लोगों की टीम है। सब लोग मिलकर इस काम को अंजाम दे रहे हैं। उनकी मेहनत रंग लाई है। स्टार्टअप नायक और बिहार स्टार्टअप कॉन्क्लेव जैसे अवार्ड्स से भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों में आज उनके सत्तू बिक रहे हैं।

शुरू किया ये पोर्टल

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सचिन कुमार ने एक पोर्टल bangletangle.in भी शुरू किया है, जहां मिथिला पेंटिंग और हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स को वे बेच रहे हैं। सचिन बताते हैं कि इन कलाकारों को दरअसल उनकी मेहनत का उचित फल नहीं मिल पा रहा था। बिचौलिए उनका शोषण करने में लगे थे। बाजार में तो उनके उत्पाद महंगी कीमत पर बिक रहे थे, लेकिन कलाकारों को इसके लिए बहुत ही कम पैसे मिल रहे थे। ऐसे में उन्होंने यह वेबसाइट बना दी।

यहां वे पूरी पारदर्शिता भी बरत रहे हैं। कलाकारों को यह पता चल रहा है कि उनके उत्पाद बिके भी हैं या नहीं और यदि बिके हैं तो कितनी कीमत पर बिके हैं। इससे कलाकारों को अब उनकी मेहनत का उचित दाम मिल पा रहा है।

जुड़ें रहें मिट्टी से

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सचिन कुमार ने जो करके दिखाया है, उससे यह साबित होता है कि यदि किसी चीज के पीछे मेहनत की जाए तो उसमें कामयाबी जरूर मिलती है। साथ ही सचिन कुमार की कहानी अपनी मिट्टी से जुड़े रहने का भी संदेश देती है।

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