कुछ सौ रुपये ले दिल्ली गया था बिहार का ये लाल, ऑस्ट्रेलिया तक फैलाया 150 करोड़ का कारोबार

पटना
धन्य होते हैं वे लोग, जो मिट्टी का कर्ज कभी भी नहीं भूलते। जिस मिट्टी में पले-बढ़े हैं, उसका कर्ज जितना ज्यादा हो सके लौटाने की चाहत उनमें हमेशा होती है। बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज के नरपतगंज ब्लॉक के अंतर्गत मिरडौल गांव के रहने वाले 31 साल के अमित कुमार जो कि इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी चला रहे हैं, ऐसे ही लोगों में से एक हैं। अमित कुमार भले ही ऑस्ट्रेलिया में बस चुके हैं, मगर उनके मुताबिक बिहारियत अभी भी उनके अंदर जिंदा है। वर्ष 2010 में अमित कुमार ने अपने गांव में एक इंजीनियरिंग कॉलेज की नींव रखी थी, जो अब बनकर तैयार हो गया है। इसका निर्माण 120 करोड़ रुपये की लागत से हुआ है।

पिता के नाम पर बिहार को दे दी बड़ी सौगात

इस इंजीनियरिंग कॉलेज का नाम मोती बाबू इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी है। मोती बाबू अमित कुमार के पिता का नाम है, जो वर्ष 2009 में चल बसे थे। अमित कुमार दास जो सॉफ्टवेयर कंपनी चला रहे हैं, उसका नाम आईसॉफ्ट सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजीज है। वर्ष 2006 में पहली बार ऑस्ट्रेलिया में एक सॉफ्टवेयर मेले में हिस्सा लेने के लिए वे गए थे। वर्ष 2008 में उन्होंने यहां अपनी कंपनी शुरू की थी।

इंजीनियर बनने का था सपना

वैसे, अमित कुमार के लिए यह सब इतना भी आसान नहीं रहा। बचपन से ही वे इंजीनियर बनना चाहते थे, लेकिन यह सपना पूरा करना उनके लिए आसान बिल्कुल भी नहीं था। सुपौल और सहरसा में उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा ली। फिर पटना के एएन कॉलेज से उन्होंने इंटर किया। वर्ष 1997 तक अमित कुमार को अंग्रेजी बिल्कुल भी नहीं आती थी। जब उन्होंने इंजीनियरिंग करने के बारे में अपने घर में बात की तो उनके पिता ने असमर्थता जताई, क्योंकि इतने पैसे थे नहीं। फिर उन्होंने सोचा कि मत्स्य पालन शुरू किया जाए, लेकिन इसके लिए भी 25 हजार रुपये की जरूरत थी। ऐसे में किसी ने उन्हें कहा कि वे दिल्ली चले जाएं और वहां कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी पकड़ लें। 3000 रुपये तो मिल ही जाएंगे।

250 रुपये लेकर पहुंच गए दिल्ली

फिर 250 रुपये जेब में रखकर अमित दिल्ली पहुंच गए। वहां एनआईआईटी के एक प्राइवेट ट्रेनिंग सेंटर में एडमिशन लेने के लिए पहुंचे। यहां उनसे अंग्रेजी में रिसेप्शन पर मौजूद लड़की ने अंग्रेजी में उनसे सवाल किया। अमित को कुछ समझ में नहीं आया कि वह क्या बोल रही है। ऐसे में उस लड़की ने उन्हें कहा कि उन्हें अंग्रेजी सीखने की जरूरत है। एडमिशन भी अमित को यहां नहीं मिला।

सीखनी पड़ी अंग्रेजी

फिर डीटीसी बस में उन्हें निराश देख किसी ने इसकी वजह पूछी और उन्हें अंग्रेजी स्पीकिंग का कोर्स करने के लिए कहा। अंग्रेजी स्पीकिंग कोर्स उन्होंने पूरा किया और उन्हें एनआईआईटी में 6 महीने के कोर्स में दाखिला मिल गया। यहां उन्होंने टॉप किया और 3 साल के प्रोग्राम में भी उन्हें एडमिशन मिल गया। बाद में उन्होंने बीए की पढ़ाई पूरी कर ली। 500 रुपये महीने पर एनआईआईटी में ही उन्हें फैकल्टी की जॉब मिल गई। वर्ष 2002 तक उनकी सैलरी बढ़कर 1500 रुपये महीने हो गई। इंग्लैंड जाने का मौका मिला, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया, क्योंकि वे अपना कुछ करना चाहते थे

सॉफ्टवेयर कंपनी की शुरुआत

Amit Kumar Das Success Story in Hindi

फिर दिल्ली के भरत नगर में उन्होंने 10×10 की एक जगह ली और यहां उन्होंने अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू की। 6 महीने तक कोई प्रोजेक्ट ही उन्हें नहीं मिला था। ऐसे में 8:00 बजे तक वे जामिया मिलिया इस्लामिया के स्टूडेंट्स को पढ़ाते थे और सुबह 3:00 बजे तक वे सॉफ्टवेयर डिजाइन करते थे। लैपटॉप तो इनके पास था नहीं। ऐसे में सीपीयू लेकर ही बस में चल पड़ते थे और लोगों से मिलकर सॉफ्टवेयर के बारे में बताते थे।

फिर माइक्रोसॉफ्ट प्रोफेशनल एग्जामिनेशन में उन्हें कामयाबी मिल गई। इसके बाद उन्हें वर्ष 2006 में ऑस्ट्रेलिया जाने का मौका मिला तो उन्होंने इसके बाद पीछे मुड़कर देखा ही नहीं।

अररिया में कॉलेज खोल चुकाया कर्ज

Moti Babu Institute of Technology (MBIT), Araria – Engineering College India

वर्ष 2010 में जब बिहार एनआरआई मीट हुआ तो इसी दौरान उन्होंने बिहार में इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की बात की। पटना और बिहटा में उन्हें जमीनें दिखाई गईं कॉलेज खोलने के लिए, लेकिन अमित ने कहा कि वे अपने गृह जिले अररिया में ही इंजीनियरिंग कॉलेज खोलेंगे, क्योंकि वहां इसकी बड़ी जरूरत है। आखिरकार 1800 एकड़ की जमीन वहां उन्हें मिल गई और कॉलेज का निर्माण कार्य शुरू हो गया। अमित के मुताबिक कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां इसमें सहयोग दे रही हैं।

अगला प्रोजेक्ट मल्टी स्पेशियलटी अस्पताल का

इसके बाद वे मातृभूमि प्रोजेक्ट पर काम करना चाहते हैं, जिसमें वे अररिया में मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल खोलना चाह रहे हैं। अमित कुमार दास ने जो किया है अपनी मिट्टी के लिए वह वाकई अद्भुत है। औरों को भी उनसे प्रेरणा लेने की जरूरत है कि मातृभूमि का कर्ज उतारना जिंदगी में कितनी अहमियत रखता है।

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