15000 की नौकरी छोड़ घर में किया ये काम, आज बिहार का ये शख्स हर माह कमा रहा लाखों

पटना

बिहार के कुमार पुरुषोत्तम बहुत से लोगों के लिए आदर्श बन गए हैं। वे बिहारशरीफ के रहने वाले हैं। कृषि से उन्होंने स्नातक की डिग्री हासिल की है। आज की तारीख में वर्मी कंपोस्ट खाद वे बना रहे हैं, जिससे उन्हें लाखों रुपए की कमाई हर महीने हो रही है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से लगभग 19 साल पहले पुरुषोत्तम ने डिग्री हासिल की थी। इसके बाद उन्हें रोजगार की तलाश थी। एक स्वयंसेवी संगठन में तब उन्हें नौकरी मिली थी और 15 हजार रुपये महीने मिल रहे थे। इतने कम पैसे में उनके लिए घर-परिवार को चलाना आसान नहीं था। आगे की राह वे तलाश रहे थे।

वर्मी कंपोस्ट बनाने का फैसला

कुमार पुरुषोत्तम ने उर्वरक बनाने का फैसला कर लिया। उन्हें लगा कि लागत और कमाई दोनों की दृष्टि से यह सही रहेगा। फिर उन्होंने घरेलू खाद बनाने का सोचा। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण की जरूरत थी। उन्हें फिर जीसस एंड मैरी कॉलेज के प्रोजेक्ट धारा के बारे में पता चला, जिससे 45 छात्राएं जुड़ी हुई थीं और बेरोजगार महिलाओं को वर्मी कंपोस्ट तैयार करने का काम दे रही थीं। पुरुषोत्तम ने यहां से वर्मी कंपोस्ट बनाने की ट्रेनिंग ले ली। किसी तरीके से 20 लाख रुपये का लोन लेकर उन्होंने रांची में ही वर्मी कंपोस्ट बनाना शुरू कर दिया।

सालाना उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य

short term traning changed life of kumar purushottam, now earns 1.50 lakh  rs per month | दो महीने के कोर्स ने बदल दी लाइफ, अब कमाता है 1.50 लाख रु  महीने

पुरुषोत्तम गोबर में सड़े हुए पत्तों के साथ केंचुए को मिलाकर वर्मी कंपोस्ट तैयार करवा रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि इसके निर्माण को 500 टन सालाना लेकर जाएं। कुमार पुरुषोत्तम ने बहुत से लोगों की मदद की है और उनकी भी फैक्ट्रियां उन्होंने लगवा दी हैं। उनका सालाना टर्नओवर भी 90 लाख रुपये के पार जा चुका है  जहां उन्होंने कभी 15 हजार रुपये की नौकरी की थी, आज वहीं उन्हें हर महीने डेढ़ लाख से पौने 2 लाख रुपये की कमाई हो रही है।

पर्यावरण के हिसाब से भी अनुकूल

15000 की नौकरी छोड़, शुरू किया ये बिजनेस, होती है लाखों की कमाई - succes  story of kumar purushottam who runs business of organic farming tedu -  AajTak

वर्मी कंपोस्ट बनाने से कुमार पुरुषोत्तम की न केवल कमाई हो रही है, बल्कि यह पर्यावरण की दृष्टि से भी अनुकूल है। इससे भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है। पानी का वाष्पीकरण भूमि से कम होता है। इसकी उपजाऊ क्षमता में भी बढ़ोतरी होती रहती है। भूजल के स्तर को भी बनाए रखने में यह मददगार होता है।

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