बिहार का गर्व: जब नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य ने कुरान से खिलजी को किया था ठीक

पटना : बिहार को अपने अनेकों चीजों पर गर्व है। बिहार की विरासत इतनी समृद्ध रही है कि इसकी कहानियां आजतक सम्मान के साथ पूरे देश और दुनिया में सुनाई जाती हैं। ऐसी है एक विरासत रही है नालंदा विश्वविद्यालय की। यह विश्वविद्यालय प्राचीन काल में न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। इसकी स्थापना 5वीं शताब्दी में सम्राट कुमारहगुप्त ने की थी। ऐसा कहा जाता है कि नालंदा दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था जहां एक समय में 10 हजार के करीब स्टूडेंट और 2000 के करीब शिक्षक थे। आइए आपको आज इसी गर्विली विरासत की एक खास कहानी सुनाते हैं।

कई दफा हुई इसे खत्म करने की कोशिश, आखिल खिलजी सफल हुआ

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भारत आने वाले आक्रमणकारियों ने नालंदा विश्वविद्यालय को खत्म करने की 3 कोशिशें कीं। 2 बार इसे फिर से बनाया गया, लेकिन तीसरी बार खिलजी इसे नष्ट करने में सफल हुआ। वह भी तब जबकि खिलजी को इस विश्वविद्यालय के आचार्य ने ही बीमारी से बचाया था। ये भी गजब का किस्सा है। लोग रक्षा करने वालों के एहसानों के बोझ से ताउम्र दबे रहते हैं लेकिन वो तो खिलजी था, एहसानफरामोश।

बख्तियार खिलजी जब बीमार पड़ा था

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यह कहानी तब की है जब बख्तियार खिलजी ने उत्तर भारत में बौद्ध शासित काफी क्षेत्रों पर कब्जा जमा लिया था। इसी दौरान एक बार वह काफी बीमार पड़ा। खिलजी एक शासक था तो उसके पास एक से एक हकीम मौजूद थे। लेकिन इस बार किसी हकीम का नुस्खा काम नहीं आ रहा था। खिलजी को किसी ने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र उसे ठीक कर सकते हैं। खिलजी को भरोसा नहीं हुआ। उसे लगता था कि उसके हकीम ज्यादा काबिल हैं।

आखिरकार वैद्यराज बुलाए गए

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खिलजी की तबीयत जब बिगड़ती ही चली गई तो उसने नालंदा के वैद्यराज श्रीभद्र को बुलाया। खिलजी अभी भी अपने ताकत के नशे में चूर था। उसने वैद्यराज के सामने एक शर्त रखी कि वो कोई दवा भी नहीं खाएगा और उसे ठीक भी होना है। कुछ सोच विचार के बाद आचार्य ने ये शर्त कबूल कर ली।

यहां से किस्से में हुई कुरान की एंट्री

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आचार्य शर्त कबूल करने के बाद लौट आए और खिलजी की बीमारी पर मनन किया। इसके कुछ दिनों बाद वह कुरान लेकर खिलजी के पास गए। और कहा कि इस कुरान के कुछ निश्चित पृष्ठ पढ़ लेने से खिलजी ठीक हो जाएगा। बताया जा रहा है कि आचार्य ने कुरान के पृष्ठों पर किसी अदृश्य दवा का लेप कर दिया था। खिलजी ने इसके पृष्ठों को पलटा तो ये लेप उसके हाथों में लगा और फिर मुंह के जरिए ये दवा का काम कर गया। खिलजी ठीक हो गया।

एहसानफरोश ने नालंदा के साथ ये कर डाला

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खिलजी अब ठीक हो चुका था। उसे तो आचार्य की शरण में होना था लेकिन हुआ इसका उल्टा। खिलजी से ये बर्दाश्त नहीं हुआ कि किसी आचार्य का ज्ञान उसके हकीमों से ज्यादा हो सकता है। इस क्रोध में उसने नालंदा को ही खत्म कर दिया। कहा जाता है कि नालंदा में इतनी पांडुलुपियां थीं कि तीन महीने तक आग ने बुझने का नाम ही नहीं लिया।

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