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ज्वाइंट कमिश्नर शैलेन्द्र पांडेय सिविल सर्विस के लिये क्यों सुझाव दे रहे हैं हिंदी छोड़ अंग्रेजी अपनाने की? वायरल पोस्ट से समझिये

New Delhi : इनकम टैक्स के ज्वाइंट कमिश्नर, आईआरएस शैलेन्द्र कुमार पांडेय ने यूपीएससी की परीक्षा हिंदी भाषा में देनेवालों के लिये सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया है, जो काफी वायरल हो रहा है। इसमें उन्होंने देश में हिंदी के साथ हो रहे दोयम दर्जे के व्यवहार पर सवाल तो उठाया है लेकिन इस नसीहत के साथ कि यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी कर रहे स्टूडेंट‍्स को इस बहस में पड़ने की बिलकुल भी जरूरत नहीं है। हालांकि उन्होंने हिंदी मीडियम से यूपीएससी की तैयारी कर रहे स्टूडेंट‍्स के असहज दबाव का बखूबी चित्रण किया है। यहां हम उनका सोशल मीडिया पोस्ट हूबहू शेयर कर रहे हैं, जो इस तरह है——– ::::

प्रिय छात्रों/हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थियों/ दोस्तों
नमस्कार 🙏
पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्मों पर सिविल सेवा परीक्षा परिणाम:2021 में हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के अत्यंत कम चयन ( एक अनुमान के अनुसार कुल सफल 761 अभ्यर्थियों में से हिंदी माध्यम के सिर्फ़ 11 ) पर चिंता जताई जा रही है । मैं भी उस चिंता में शामिल हूँ । मैंने स्वयं हिंदी माध्यम से सिविल सेवा परीक्षा -2010 उत्तीर्ण की है तथा हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के ऊपर माध्यम की वजह से कम से कम साक्षात्कार में एक ‘असहज दबाव’ को महसूस किया है ।
विगत कई वर्षों से सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों के कम चयन पर सुधीजनों के द्वारा बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है अत: मैं उन बातों की पुनरावृत्ति नहीं करना चाहता । यह सर्वविदित है कि सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा एवं मुख्य परीक्षा के प्रश्नपत्रों के हिंदी अनुवाद की गुणवत्ता अत्यंत निम्न स्तर की होती है तथा एक ही प्रश्न के अंग्रेज़ी वर्जन और हिंदी वर्जन का अर्थ न सिर्फ़ अलग अलग होता है, बल्कि कई बार हास्यास्पद भी होता है । दुर्भाग्य यह है कि अर्थभिन्नता की स्थिति में अंग्रेज़ी वर्जन को सही माना जाता है । उचित तो यह होता कि भारतीय भाषा को सम्मान देते हुए हिंदी वर्जन को सही माना जाता । यह भी कहा जा सकता है कि प्रश्नपत्रों का अनुवाद अंग्रेज़ी से हिंदी में क्यों हो , क्यों न कभी प्रश्नपत्र मूल रूप से हिंदी में बने और फिर उसका अंग्रेज़ी अनुवाद हो । हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के साथ विभिन्न स्तरों पर भेदभाव की लंबी शिकायतें हैं । यह एक लंबी और ऊबाऊ बहस है जिससे आपको नकारात्मक सुख तो मिल सकता है लेकिन इस परीक्षा के अनुकूल खुद को तैयार करने में कोई मदद नहीं मिलेगी ।
प्रिय दोस्तों, मैं आप सभी से यथार्थ के धरातल पर बात करना चाहता हूँ । हो सकता है आपको मेरी बातें आकर्षक ना लगें । किसी को भी अपने जीवन में दो बातों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी होता है :
1. Area of concern
2. Area of control
Area of concern वह होता है जहां आप सिर्फ़ चिंता जता सकते हैं लेकिन आपका कोई नियंत्रण नहीं है जैसे अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने से विश्व में आतंकी गतिविधियों में बढ़ोतरी हो सकती है । इसमें आप सिर्फ़ चिंता जता सकते हैं लेकिन कुछ कर नहीं सकते । यदि हम और आप, दिन रात तालिबान को गाली दें तो भी तालिबान का कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं , हाँ अपना क़ीमती समय ज़रूर ज़ाया करेंगे ।
Area of control वह होता है जहां आप चिंता भी जता सकते हैं और कुछ हद तक नियंत्रण भी कर सकते हैं । जैसे विश्व में प्रदूषण बढ़ रहा है । आप चाहें तो पेड़ लगाकर और प्लास्टिक का प्रयोग नहीं कर के तथा अन्य कई तरीक़ों से प्रदूषण को रोकने में अपना योगदान दे सकते हैं । आपका एक छोटा प्रयास बड़ा परिवर्तन ला सकता है और बेहतर कल का निर्माण कर सकता है ।
अब आपसे मेरा सवाल है कि क्या आप किसी आयोग को, किसी परीक्षा को किसी विशेष तरीक़े से कराने के लिए बाध्य कर सकते हैं ? क्या आपका सचमुच किसी परीक्षा नियामक संस्थान या आयोग पर कोई नियंत्रण है ? इन सबका उत्तर है नहीं! प्रश्नों के हिंदी वर्जन में गलती/साक्षात्कार में हिंदी माध्यम से होने के बावजूद भी अभ्यर्थी को अंग्रेज़ी बोलने के लिए बाध्य करना आदि समस्याएँ, बहुत पहले से चली आ रही हैं । यह समस्याएँ CSAT आने के बहुत पहले से चली आ रही हैं और इन बाधाओं के बावजूद भी हिंदी माध्यम से संतोषजनक परिणाम आते थे । फिर ख़राब प्रदर्शन की वजह क्या है ? कई लोग कोचिंग संस्थानों को गाली दे रहे हैं । मैं कोचिंग संस्थानों को गाली देने को सही नहीं मानता । क्या किसी कोचिंग संस्थान ने आपको घर से खींच कर और ज़बरदस्ती आपसे पैसे लूटे हैं ? मैं किसी कोचिंग संस्थान की तरफ़दारी नहीं कर रहा हूँ । मैंने स्वयं बिना कोचिंग के सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की है ( साक्षात्कार में Mock interview देने के लिए एक दो कोचिंग में गया था ) । मेरा इस पूरे मुद्दे के सरलीकरण से रंज है । दरअसल इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर लिखे गए अधिकांश लेख ostrich syndrome की कैटेगरी के हैं जो असल समस्या से मुँह चुराते हुए लिखे गए हैं । एक पक्षी होता है ostrich जिसे हिंदी में शुतुरमुर्ग कहते हैं वो इतना innocent होता है कि किसी ख़तरे की स्थिति में उसका मुक़ाबला करने की बजाय वो अपना मुँह किसी चीज़ में (रेत/मिट्टी/झाड़ी) में छुपा लेता है । उसे लगता है कि वो शिकारी को नहीं देख पा रहा है तो वो शिकारी से बच जाएगा और इसी ग़लतफ़हमी में शिकारी उसका आराम से शिकार कर लेता है ।
प्रिय साथियों, वर्ष 2011 में CSAT को लाया गया था । परीक्षा प्रारूप में उसी समय से आमूल चूल परिवर्तन आ गया था । यह वर्ष 2021 है । यानि पूरा एक दशक बीत गया है । एक दशक का समय बहुत होता है किसी परीक्षा को समझने और उसके लिए स्वयं को तैयार करने के लिए । आप किसी खेल का नियम तय नहीं कर सकते हैं लेकिन उसके अनुसार अभ्यास करके खुद को तैयार कर सकते हैं । आई ए एस/ आई पी एस /आई आर एस /आई एफ एस बनने का सपना आपका अपना है ना कि किसी कोचिंग का । और ना ही किसी आयोग को इससे मतलब है कि आपको माध्यम की वजह से सिविल सेवा में जाने से वंचित होना पड़ा है । लक्ष्य या सपना एक एहसास और भावना होता है जिसे देखने और संजोने वाला व्यक्ति उसे हर क़ीमत पर पूरा करता है । माध्यम का रोना रोने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है । मेहनत करो भाई हिंदी वालों …इस परीक्षा की वर्तमान माँग को समझने में कहीं न कहीं गंभीर चूक हो रही है । रटे रटाए, घिसे पिटे , बत्रा से ख़रीदे हुए बासी प्रिंटेड नोट्स पढ़ने से कुछ नहीं होने वाला । पिछले वर्षों के प्रश्न पत्र पढ़ो और उसको समझ के किताबों का चयन कर के उनको विस्तार से पढ़ो । कोचिंग हमेशा से सहायक की भूमिका में रहे हैं । जो कोचिंग संस्थान आपको सेलेक्शन दिलवाने की बात करें और आप इस वादे पर मर मिटें तो आपके इस दीवानेपन के लिए कोचिंग संस्थान नहीं बल्कि आप दोषी हैं । आप दुधमुँहे बच्चे हो क्या कि कोई भी बहका दे ? लगभग सभी ग्रेजुएशन कर के दिल्ली तैयारी करने जाते हैं । यदि कोचिंग संस्थान के सेलेक्शन दिलाने के वादे पर आपने बाबूजी का पैसा दे दिया मतलब आप सिविल सेवा के लिए प्रथम दृष्टया अयोग्य हो । मैं यहाँ साफ़ कर दूँ कि हर पेशे में अच्छे/बुरे लोग हैं और कोचिंग पढ़ाने वाले इसके अपवाद नहीं हैं । मैं कई कोचिंग पढ़ाने वालों को जानता हूँ जो ईमानदारी से अपना काम करते हैं और बहुत ही सहयोगी प्रवृति के हैं । यह मत भूलिए कि कोचिंग भी एक रोज़गार है । वो पेशेवर नैतिकता का पालन करते हुए आपके सहयोगी हो सकते हैं लेकिन आपके असफल होने पर आपके साथ गले लगकर रोने नहीं आएँगे ।
हिंदी माध्यम वालों ! इज़्ज़त का सवाल है, लग जाओ ।
जो बच्चे अभी यू पी बोर्ड से इंटरमीडिएट में हैं और सिविल सेवा में जाने का सपना देख रहे हैं तो बाबू तुम लोग धीरे से ग्रेजुएशन में अंग्रेज़ी माध्यम ले लो । हिंदी पट्टी के बच्चे इतने भावुक होते हैं कि किसी रिश्तेदार के एक ताने या किसी लड़की के एक इनकार का बदला आई ए एस बनकर लेते हैं फिर ये तो एक भाषा की बात है । ग्रेजुएशन के 3 साल में एकदम टापक्लास का अंग्रेज़ी सीख जाओगे , फिर ये माध्यम का रोना रोने से आज़ादी मिल जाएगी । मैं यहाँ प्रैगमेटिक बात कर रहा हूँ और हिंदी के ऊपर अंग्रेज़ी को श्रेष्ठ नहीं बता रहा या तवज्जो नहीं दे रहा हूँ । जो सीनियर भइया/बहिनी लोग बहुत आगे निकल चुके हैं और अब माध्यम नहीं बदल सकते उनके लिए मेरा सुझाव है कि दिल छोटा ना करें । मैंने ऊपर के पैराग्राफ़ में जो कटुवचन कहें हैं उनका पालन करें , विश्वास करें सफलता मीठी मिलेगी ।
मुझे सिविल सेवा परीक्षा दिए हुए लगभग 12 साल हो गए हैं और मुझे आज की वस्तुस्थिति का सटीक ज्ञान नहीं है इसलिए मैंने कुछ ग़लत या अप्रासंगिक लिख दिया हो तो क्षमा करना भइया/बहिनी लोग ।
अगले साल “फोड़” देने की मंगलकामना के साथ
आपका
शैलेंद्र कुमार पांडेय

 

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