बस 4 कठ्ठा था खेत, बिहार के खगड़िया का नौजवान घर के पिछवाड़े का इस्तेमाल कर बना लखपति

पटना
आपके पास खेत ही नहीं होंगे तो खेती-किसानी से जुड़े काम क्या खाक करेंगे। ऐसा अक्सर सुनने को मिलता है। खेत के अभाव में भूमिहीन लोग अक्सर महानगरों का रुख करने को मजबूर होते हैं। इसके अलावा जिनके पास खेत है वो भी उचित ट्रेनिंग के अभाव में इसका सही से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। कोरोना के दौर में जब भारतीय अर्थव्यवस्था नकारात्मक दौड़ लगा रही है, यहां तक कि बांग्लादेश भी आगे नजर आ रहा है तो भविष्य में आसानी से नौकरी की कल्पना करना कठिन लग रहा है। ऐसे में अपना काम ही वह चारा है जिससे खुद को समाज में खड़े होने लायक बनाया जा सकता है। लेकिन अपना काम शुरू करने के लिए प्रेरणा होनी चाहिए। ऐसी ही प्रेरणा वाली कहानी खगड़िया के रंजय पासवान की है।

चार कट्ठा खेत ही था बस

रंजय पासवान 9वीं पास हैं। घर के पास थोड़ी सी जमीन थी। कुल रकबा 4 कठ्ठा ही था। अब आप ही सोचिए कि इतनी जमीन में क्या होगा। रंजय पासवान के लिए अपने घर का पालन पोषण करना भी मुश्किल साबित होता था। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उन्हें बेंगलुरु जाना पड़ा था। वहां वो ईंट भट्ठे पर काम करते थे। लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा था। ऐसे में वो गांव लौट आए।

कृषि विज्ञान केंद्र खगड़िया ने दिखाया रास्ता

रंजय पासवान के अंदर काम करने को लेकर जुनून था। इसी जुनून ने उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र खगड़िया के दरवाजे पर पहुंचा दिया। वहां उन्हें पशुपालन, मुर्गी पालन, बकरी-बकरा पालन की उन्नत तकनीक समझाई गई। वैज्ञानिकों ने उन्हें अर्द्ध सघन मुर्गीपालन तकनीक अपनाने की सलाह दी। यह गजब की तकनीक थी जिसकी मदद से जमीन नहीं होते हुए भी रंजय पासवान का काम चल निकला। आइए आपको विस्तार से इस तकनीक के बारे में जानकारी देते हैं। ऐसा इसलिए ताकि अगर आप भी रंजय पासवान जैसे हालातों में हों तो आपको इसका रास्ता दिख सके।

अर्ध सघन मुर्गी पालन तकनीक

ये तकनीक काफी कम लागत की होती है। रंजय पासवान ने ट्रायल के रूप में इसे अपनाया। उन्होंने 200 वनराजा चूजों को अर्ध सघन बैकयार्ड यानी घर के पीछे के हिस्से में इनके पालन की शुरुआत की। 200 वनराजा चूजों के पालन से तैयार हुईं मुर्गियों ने रंजय ने लगभग 11000 अंडे और 500 किलो मांस पहले साल में ही हासिल किया। पहले साल ही में ही चार कठ्ठे की जमीन पर लगभग एक लाख रुपये की शुद्ध आमदनी हुई। रंजय पासवान चौपाल में केवल बात सुनने को गए थे। वहीं उनको ये आइडिया आया। रंजय पासवान की इस कामयाबी से अन्य किसान भी इस तकनीक को अपना कर खुशहाल हो रहे हैं।

रंजय पासवान की वजह से खगड़िया की पहचान कम लागत की अर्ध सघन बैकयार्ड मुर्गी पालन के लिए हो रही है। इसमें बिना मजदूर रखे घर के सदस्यों द्वारा ये काम हो जा रहा है। अब रंजय इसकी ट्रेनिंग भी देती हैं। बताते हैं कि कैसे कम खर्च में इस काम को किया जा सकता है। रंजय बताते हैं कि मुर्गी पालन छोटे किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *